जनता तो मुक्ति दिवस मनाना चाहती है मगर प्रशासन उसे नकारने में तुला है.
जागरुक नागरिकों ने किया अपने गौरव शाली इतिहास को याद

सिलवासा: बीते 22 जुलाई को दादरा पंचायत कार्यालय के परिसर में स्थित शहीद स्मारक पर कांग्रेसी नेता प्रभु टोकिया के नेतृृत्व में दादरा नगर हवेली के कुछ जागरुक नागरिकों , समाज सेवकों और आदिवासी एकता परिषद के कार्यकर्ताओ ने स्वतंत्रता संग्रामियों को श्रद्धा सुमन अर्पित कर बड़ी श्रद्धा से याद किया .इस मौके पर दादरा के प्रबुद्ध नागरिक, दादरा सरपंच और उनके साथी , कमलेश देसाई और अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित थे.
कार्यक्रम की शुरूआत दीप प्रज्वलन से हुई तत्पश्चात सभी ने स्वतंत्रता संग्रामियों के स्मारक पर पुष्प अर्पित किए और सादर प्रणाम किया.
इस मौके पर प्रभु टोकिया ने स्वतन्त्रता संग्रामियो की शहादत पर प्रकाश डाला. उन्होंने विस्तार पूर्वक बताया कि कैसे हमारे पूर्वजों ने संघ प्रदेश को पुर्तगीज के चंगुल से बाहर निकाला. उन्होंने बताया कि
इसी दिन 1954 को दादरा नगर हवेली में स्वतंत्रता ने दस्तक दी थी. इसी दिन दादरा नगर हवेली के स्वतन्त्रता सैनानियों ने दादरा गांव को आजाद कराकर पुर्तगीज को भगाने की शुरुआत की थी . इसके बाद 2अगस्त 1954 को सिलवासा और खानवेल को भी आजाद करा लिया गया. इसके बाद तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहर लाला नेहरू ने 11अगस्त 1961को दादरा नगर हवेली को भारत संघ में शामिल कर लिया.
इस कार्यक्रम के दौरान कुछ बुद्धि जीवियो ने अपना दुख बयान करते हुए कहा कि दादरा नगर हवेली आज बहुत कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा है लोकशाही और लोकतंत्र बिल्कुल खत्म हो चुका है नौकरशाही हावी हो चुकी है, प्रशासन को ऐसा गौरवशाली दिन बड़े धूमधाम से मनाना चाहिए था लेकिन दुर्भाग्य से प्रशासन का संघ प्रदेश के इतिहास के प्रति शुरू से ही नकारात्मक रवैया रहा है इसलिए वो इतिहास की उपेक्षा कर रहा है. यह बहुत ही निंदनीय और दुर्भाग्यपूर्ण बात है . कई बार तो हमें लगता है ये सब जानबूझकर किया जा रहा है ताकि आने वाली पीढ़ी को अपने गौरव शाली इतिहास का पता ही न चले. दुर्भाग्यपूर्ण बात यह भी है कि दादर नगर हवेली के चुने हुए जनप्रतिनिधियों को इस दिन के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. बीजेपी, शिवसेनाJDU समेत अन्य राजनैतिक पार्टियों को भी इसकी जानकारी नहीं है इसलिए वे लोग भी इस दिन को नहीं मनाते. जरूरत है लोगों को जागरुक करने की ताकि इतिहास को ताजा रखा जा सके. हम तो सिर्फ जनता से अपील कर सकते है कि अपने इतिहास, अपनी संस्कृति , अपनी धरोहर को खुद बचाओ. प्रशासन से तो उम्मीद करना बेकार है क्योंकि वो खुद हमारा इतिहास मिटाने पर तुला है. प्रशासन ने मुक्ति दिवस की छुट्टी बंद करवा दी है, मुक्ति दिवस का समारोह मनाना बंद कर दिया है, तारपा महोत्सव मनाना बंद कर दिया है.
इससे बड़ी दुर्भाग्य की बात और क्या होगी. दानह के राजनैतिक दलों और चुने हुए प्रतिनिधियों से उम्मीद करना बेकार है, फिलहाल तो ये सभी प्रशासन के हाथों की कठपुतली बने हुए है. इसलिए अगर दानह को अपने इतिहास और अपनी धरोहर को बचाना है तो जनता को खुद जागरुक होना पड़ेगा वरना एक दिन दानह का गौरवशाली इतिहास सरकारी कागजों में दफन हो जाएगा.



