
तपोवन, संजान:27 फरवरी (रविवार) सनातन संस्कृति के शास्त्रों में माता-पिता के सम्मान में मातृदेवो भव:, पितृ देवो भव: , आचार्य देवो भव: का वर्णन आता है। असली जन्नत तो माता-पिता के चरणों में है, इनका पूजन करने वाला वातावरण वैकुण्ठमय हो जाता हैं । भगवान गणेशजी अपने माता-पिता का पूजन कर प्रथम पूजनीय बने और माता-पिता, शिव-पार्वती ने गणेशजी के ललाट पर स्पर्श करके उन्हे त्रिलोचन बना दिया। परन्तु आजकल 14 फरवरी वेलेंटाईन डे – यह पाश्चात्य (विदेशी) गंदगी हमारे हिंदुस्तान को तोड़ रही है, जिसमें युवा वर्ग की भारी तबाही होती हैं वे अपना सर्वनाश कर बैठते है ।
इसी कड़ी में मराठी स्कूल, खोडियार नगर,कोपरली रोड, छरवाड़ा, वापी, जिला-वलसाड़, गुजरात में सामूहिक मातृ पितृ पूजन व संस्कृति सुरक्षा 2022 कार्यक्रम के अंतर्गत सभी महाराष्ट्र विशेष क्षेत्र की भाई बहनों के द्वारा मातृपितृपूजन का सेवा कार्य हुआ।
सनातन संस्कृति के संस्कारों को पुनर्स्थापित करने के लिए संत श्री आशारामजी बापू ने सन 2006 में 14 फरवरी को वेलेन्टाइन डे के स्थान पर शुद्ध व असली प्रेम दिवस अर्थात मातृ-पितृ पूजन दिवस की पहल की जो आज देश विदेश में सर्वव्यापी हो चुका है । इस मातृ-पितृ पूजन कार्यक्रम में बच्चों दवाई अपने माता-पिता, अभिभावकों व गुरुजनों को तिलक लगाकर, अक्षत व पुष्प चढाकर उनकी पूजन किया जाता था उन्हें प्रसाद खिलाकर व माला पहनाकर आरती उतारी उतारकर सात परिक्रमा की जाती हैं । माता-पिता अपने बच्चों को गले लगाकर भावपूर्वक आशीर्वाद देते हैं । माता-पिता व बच्चे आपसी प्रेम पाकर भावविभोर हो जाते हैं तथा उनकी आंखों से प्रेम के आंसू छलक आते हैं । आज की युवा पीढ़ी जो पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण कर वेलेंटाइन डे जैसे दिवस मना रही है, उसके लिए मातृ पितृ पूजन दिवस अच्छी पहल है |





